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गंगटोक यात्रा: नाथुला पास- एक बर्फ़ीली सरहद पर सिकुड़ते हुए कदम (Nathula Pass, Sikkim)

तो पिछले हफ्ते मैं बात कर रहा था एक बर्फीली दुनिया की जिसे हमने सिक्किम के स्वर्ग की उपाधि दी थी। हिमालय की गोद में बसे सिक्किम की यात्रा के हमारे अंतिम चरण में मैं आपको रु-ब-रु कराऊंगा एक बर्फीली सरहद की जहाँ का दीदार करना मेरे जैसे हर मुसाफिर का सपना होता है। पुराने ज़माने में यहाँ एक व्यापारिक सिल्क रूट हुआ करता था भारत और चीन के बीच।  जी हाँ , आपने बिलकुल सही अनुमान लगाया , मैं बात नाथुला की ही कर रहा हूँ।

नाथुला दर्रे का प्रवेश द्वार: बर्फीली सरहद पे ठिठुरते मुसाफ़िर
सिक्किम दर्शन के अंतिम पड़ाव में हम गंगटोक से मात्र 54 किमी पर स्थित भारत  -चीन के इस महत्वपूर्ण सीमा के लिए निकल पड़े। मन में एक उथल सी मची थी की आज एक अन्तर्राष्टीय सीमा देखने को मिलेगा। लेकिन सहसा कुछ ही दुरी पर एक ताजा ताजा भूस्खलन हुआ था जिससे रोड जाम हो गया। यह यहाँ की सबसे आम समस्या है। काफी देर इस जाम में फँसने के कारण नाथुला जाने की सारी उम्मीदों पे पानी फिरने ही वाला था लेकिन अचानक रोड जाम दो घंटे बाद ख़त्म हुआ। आगे बढ़ते गए और एक से बढ़कर एक दृश्यों का आनंद लेते गए।यूँ तो रास्ते में छोटे बड़े अनेक जलाशय थे जिनकी सतह पर आधी-अधूरी बर्फ की परत भी जमी हुई थी। 
       इन्ही में से एक सुविख्यात झील है- छंगु लेक। झील की सतह पर पास के सटे हुए बर्फीले पर्वत का प्रतिबिम्ब एक ऐसा दृश्य पैदा कर रहा था मानो किसी महान कलाकार की कृति हो। वहीं कुछ लोग याक की सवारी का भी मजा ले रहे थे। तापमान बहुत कम था फिर भी सभी मुसाफिरों में एक जोश था।
            ऊंचाई बढ़ती ही जा रही थी , फिर भी यह सड़क यामथांग घाटी वाले सड़क से काफी अच्छी थी क्योकि यह सेना द्वारा संचालित था। दोनों ओर से बर्फ की मोटी मोटी चादरें और बीच में थे हम। कहीं कहीं पर्वतो पर उगे लम्बे लम्बे नुकीले वृक्ष प्रकृति द्वारा धरती पर उकेरे गए चित्रकारी दर्शा रहे थे। दोपहर के एक बज चले थे और हम पहुंच रहे थे अपनी मंजिल भारत-चीन नाथुला सीमा पर। धीरे धीरे नाथुला दर्रे की ओर हमारे बढ़ते हुए कदम थे और दूसरी तरफ थी मौसम की बेवफाई। अगर आपको पर्वतों पे जाना है तो सुबह सुबह ही निकल जाइए और शाम ढलने से पहले ही दो तीन बजे तक वापस आ जाइए वरना क्या पता कब अचानक बादल घुमड़ आये और सबकुछ एक घने कोहरे में खो जाय। इसी बात का डर मुझे भी सता रहा था। रास्ते में कुछ सेना के छावनी भी हमें दिखाई पड़े। खैर हम अब दर्रे के दायरे में कदम रख चुके थे। जैसे ही गाडी से मैं बाहर निकला, बिलकुल ठंडी हवाएँ काटने को ही दौड़ पड़ीं। दिन के एक बजे भी तापमान शुन्य से कम और रोड पे बर्फ जमी थी। एक पल भी खड़ा रहने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा था। कान एकदम सुन्न पड़ गए। चमड़ी का हाल ऐसा था कीcकाटो तो खून ना निकले, बिलकुल खून जमाने वाली ठण्ड थी, आखिर यह 14000 फ़ीट की ऊंचाई जो थी। सभी मुसाफिर कांपते हुए सीढ़ी पर चढ़ रहे थे। दूर से ही नाथुला का द्वार दिखाई दिया जिसपर अंग्रेजी और चीनी में नाथुला लिखा हुआ था। हवा का रुख भी बिल्कुल उल्टा ही था। एक एक कदम चलना दुश्वार था, लेकिन ज्यों ही हम सीढ़ी पर रूककर पीछे मुड़े तो देखा की बर्फ से ढकी हुई निचली चोटियों का सौंदर्य एकदम अविश्वनीय है एकदम अकल्पनीय है। वहां सिर्फ दो ही रंग दिख रहे थे सफ़ेद और काला। कुछ ही दुरी पर एक तार का बेड़ा दिखा जो की अन्तर्राष्टीय सीमा का प्रतीक था। एक नौजवान सेना ने बताया की वो उस पार का पहाड़ चीन का है। नीचे इस चित्र में तार के इस बेड़े को देखिये। एक चीनी सैनिक भी सीमापार खड़ा है।
                        तार के इधर था भारत और उधर था चीन। हमें कुछ मिनट यहाँ रुकने में इतनी दिक्कत हो रही थी और ये सेना थे जो रात दिन सीमा पर तैनात रहते हैं। चीनी सैनिको का एक दल भी तार के उस पार अपनी सरहद की चौकसी कर रहा था। जल्दी जल्दी जानलेवा ठण्ड से बचते हुए हम वापस गाडी के अंदर आ गए। वापसी में लगभग शाम के दो-तीन बज रहे होंगे लेकिन यह क्या? अचानक काले काले बादलों ने हमारी आँखों के आगे विकराल अँधेरा खड़ा कर दिया। लेकिन वहां के वाहन चालकों की कार्यकुशलता के वजह से हम सुरक्षापूर्वक जा रहे थे। रास्ते में एक बाबा मंदिर आता है लेकिन तेज बारिश और बर्फ़बारी के कारण वहां जाना संभव ना हो पाया। धीरे धीरे मौसम का मिजाज साफ़ हुआ और हम नाथुला की एक उत्तेजक यात्रा कर वापस अपने होटल में दाखिल हुए।

Comments

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